भारतीय मुसलमानों के लिए जीवन में हिंसा एक बुनियादी अनुभव है. देर-सवेर उन्हें इसका सामना करना ही पड़ता है. इससे बचने का कोई रास्ता नहीं है, कम से कम अभी तक तो नहीं है. यह मुस्लिम इलाकों में पुलिस मुठभेड़ और परिचतों पर बरसाए गए आंसू गैस के गोलों की कहानियों के माध्यम से हर मुस्लिम की अनुभूति का हिस्सा है.
यह अनुभव आपके सपनों में शामिल होकर, 10 साल पहले हुए गैस सिलेंडर के ज़ोरदार धमाके का रूप धर कर आपको नींद से झकझोर कर जगा देता है. आगे चल कर आप सरकार से डरने लगते हैं. दूर से ही खाकी वर्दी को देख कर आप उलटे पांव चल देते हैं. लेकिन, हममें से कुछ लोग उन हिंसक घटनाओं के कारण ही मज़बूत बने, जिन्होंने हमारी ज़िंदगी को झकझोर दिया था. तेज़ी से हाशिए पर धकेल दिए जाते हुए, मुसलमानों ने अपने विकास के रास्ते पर सामाजिक और राज्य की ओर से खड़ी की गईं बाधाओं को चुनौती देने और उन पर फ़तह पाने का लगातार प्रयास किया है. यह वह कहानी है जो आपको ज़ारा चौधरी के हालिया संस्मरण, ‘दि लकी वंस’ (ख़ुश क़िस्मत लोग) में मिलेगी, जिसमें वह अपने बचपन, पारिवारिक कहानियों और अहमदाबाद शहर में बड़े होने के वर्षों को याद करती हैं. वह उस अवधि में राज्य की राजनीतिक वास्तविकता और भयावह हिंसा को भी बयां करती हैं.
2021 की शुरुआत में जब मैं सब कुछ भूल कर किताबों में घुसा हुआ था, मेरे हाथ चौधरी की आत्मकथा लगी, जिसका टैक्स्ट उन्होंने अपने स्नातकोत्तर कोर्स के लिए तैयार किया था. वह किताब मैंने एक बैठकी में पढ़ डाली. मैं हैरान था कि कैसे यह किताब मुसलमानों को लेकर स्थापित धारणाओं, लुप्त हो चुकी गंगा-जमुनी तहज़ीब या मुल्लाओं का मुस्लिम राजनीति में वर्चस्व, से परे पहुंच जाती है.
जल्द ही, मुझे पता चला कि हमारी ज़िन्दगी आपस में जुड़ी हुई है. अहमदाबाद में पली-बढ़ी चौधरी, 2002 के मुस्लिम विरोधी दंगों के दौरान 16 साल की थीं. मैं उस समय छह साल का था और ख़ानपुर में उनके जैस्मीन अपार्टमेंट से कुछ किलोमीटर दूर कालूपुर-दरियापुर मोहल्ले में रहता था. जब मैंने उनकी आत्मकथा पढ़ी, तो 2002 में हमने जो हिंसक नारेबाज़ी देखी थी, वह जीवंत हो उठी. 2024 में चौधरी ने अपनी आत्मकथा का एक अधिक सुसंगत संस्करण प्रकाशित किया, जो एक ऐसे घर में एक औरत होने के इर्द-गिर्द घूमता है, जहां उसका सम्मान नहीं किया जाता और जहां उसकी मां, जो मूल रूप से तमिलनाडु की थीं, को परिवार ने हाशिए पर धकेल दिया था.